रविवार, 3 अक्टूबर 2010
कौआ तेरी यही कहानी......???
हरे भरे जंगलो के ख़त्म होने और आज के दौर में कंक्रीट के जंगलो के तेजी से फैलने के चलते अब एक फिल्म के गीत "झूठ बोले कौआ काटे..." जैसी बात अब बेमानी हो कर रह जायेगी, क्योंकि अब आज के आधुनिक मानव सभ्यता के कारण पर्यावरण को साफ़ रखने वाले कौआ जैसे पंक्षी पर संकट गहराता जा रहा है शहरों में कौआ दिखना तो अब ना के बराबर हो चली है, कौए कि प्रजातियाँ ख़त्म होने के कगार पर है, अब कौऔ कि बात करना भी बेकार लगेगा जब हमारी अगली पीढ़ी पूछेगी कि कौआ कैसा होता था या कैसा होता है तो हम क्या जबाब देंगे, शेर, हाथी या किसी भी तरह के जंगली जानवर दिखाने के लिए जब हम चिड़ियाघर जाते है तो अब कौआ से अगली पीढ़ी को रूबरू करने के लिए चिड़ियाघर जाना होगा, मानव समाज का पशु पक्षियों से गहरा नाता है ये किसी भी तरह के प्राकृतिक आपदा का संकेत भी देते है, तो वही ये हमारे धार्मिक अनुष्ठानो में परोक्ष और अपरोक्ष रूप से भी जुड़े रहते है,
मैने अपने बचपन में कौऔ के झुण्ड के झुण्ड को आसमान पर उड़ते हुए देखा है घरो के मुंडेर पर या आँगन में काँव - काँव करते देखा और सुना है जब कोई कौआ छत पर कांव - कांव करता तो घर के बड़े बुजुर्ग कहते कि आज कोई आने वाला है या कोई सन्देश ही आने वाला है पर अब तो वो दिन लड़ गए ना कौए दिखते है और ना ही काँव – काँव, इन दिनों पितृ पक्ष चल रहा है और इस समय कौऔ कि बड़ी याद आती है क्योंकि इन दिनों उनका विशेष महत्त्व रहता है और अब तो उनकी तलाश की जाती है, फिर भी ये नहीं मिल रहे है, शास्त्रों के मुताबिक़ पितरो की आत्मा की तृप्ति के लिए गाय, कुत्ता और कौआ को खाना खिलाने के बाद ही ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है और कहा जाता है कि इन दिनों गाय, कुत्ता और कौआ के रूप में पितृ धरती पर आते है और अपने वंशजो के हाथ से भोजन ग्रहण कर उन्हें आशीर्वाद देते है, और फिर वापस अपने लोक लौट जाते है पर इन दिनों लोग घंटो छतो पर खड़े होकर या मैदानों में कौऔ का इंतज़ार करते है पर एक भी कौआ दिख जाए तो बड़ी बात हो पर कौआ है कि दिखता ही नहीं है.
शास्त्रों के मुताबिक़ कौए भी शकुन - अपशकुन बताते है और इनमे से तो कई अभी भी हिंदू धर्म में प्रचलित हैं। कई पशु-पक्षियों को भी शकुन-अपशकुन की मान्यताओं से जोड़ा गया है। कौआ भी इन्हीं में से एक है। कौए को पितरों की संज्ञा भी दी गई है। कौओं से जुड़ी शकुन-अपशकुन की कई मान्यताएं काफी प्रचलित है। इन्हीं में से कुछ मान्यताएं नीचे उल्लेखित हैं
1- यदि बहुत से कौए किसी नगर या गांव में एकत्रित होकर शौर करें तो उस नगर या गांव पर भारी विपत्ति आती है।
2- किसी के भवन पर कौओं का झुण्ड आकर शौर मचाए तो भवन मालिक पर कई संकट एक साथ आ जाते हैं।
3- यदि किसी व्यक्ति के ऊपर कौआ आकर बैठ जाए तो उसे धन व सम्मान की हानि होती है। यदि किसी महिला के सिर पर कौआ बैठता है तो उसके पति को गंभीर संकट का सामना करना पड़ता है।
4- कौआ यदि यात्रा करने वाले व्यक्ति के सामने आकर सामान्य स्वर में कांव-कांव करें और चला जाए तो कार्य सिद्धि की सूचना देता है।
5- यदि कौआ पानी से भरे घड़े पर बैठा दिखाई दे तो धन-धान्य की वृद्धि करता है।
6- कौआ मुंह में रोटी, मांस आदि का टुकड़ा लाता दिखाई दे तो उसे अभिष्ट फल की प्राप्ति होती है।
7- पेड़ पर बैठा कौआ यदि शांत स्वर में बोलता है तो स्त्री सुख मिलता है।
8- यदि उड़ता हुआ कौआ किसी के सिर पर बीट करे तो उसे रोग व संताप होता है। और यदि हड्डी का टुकड़ा गिरा दे तो उस व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है।
9- यदि कौआ पंख फडफ़ड़ाता हुआ उग्र स्वर में बोलता है तो यह अशुभ संकेत है। यदि कौआ ऊपर मुंह करके पंखों को फडफ़ड़ाता है और कर्कश स्वर में आवाज करता है तो वह मृत्यु की सूचना देता है।
अभी पिछले दिनों मै कोलकाता गया था और वहां पर शहर से बाहर मैंने कौऔ के झुण्ड देखे तो मुझे संतोष हुआ कि अभी इनका अस्तित्व ख़त्म नहीं हुआ है लेकिन शहरी इलाको से इनके ख़त्म होने के पीछे मुझे लगता है कि ग्लोबल वार्मिंग भी एक कारण हो सकता है,देश में ग्लोबल वार्मिग के पीछे मोबाइल और टेलीविजन की भूमिका कम नहीं है। मोबाइल और टेलीविजन की तरंगों से न सिर्फ आम जनजीवन प्रभावित हो रहा है, बल्कि पशु -पक्षी भी इसकी चपेट में आ रहे हैं एक शोध के अनुसार मोबाइल तरंगों के क्रॉस प्रक्रिया में वृद्धि होने से पक्षियों की मौत हो जा रही है। सबसे अधिक प्रभावित पक्षियों में हो रही है,इनमे सबसे अधिक प्रभावित कौए हो रहे है इनकी संख्या आधी से भी कम हो गयी है। यहीं वजह है कि शहरी इलाके में कौआ पहले की तरह नहीं दिखते। जब मोबाइल और टीवी का इस्तेमाल जोर पकड़ने लगा और तरंगें हवा में आने लगीं तो उक्त प्रजाति के पक्षियों ने शहर से निकलकर गांवों में जाकर पेड़ों पर अपना आशियाना बनाया,लेकिन अब तो गावों में भी मोबाइल पहुंच गया, टीवी भी घर-घर में लग गया। कई कंपनियों के मोबाइल के नेटवर्क से निकलनेवाली तरंगों का क्रॉस कनेक्शन होने लगा। जिसका प्रभाव पक्षियों के पूरे शरीर पर पड़ने लगा और पक्षी मरने लगे,परन्तु अभी भी समय है और अभी से अगर इनके प्रति लोगो को जागृत नहीं किया गया और इन पर्यावरण के रक्षक कौऔ को बचाया नहीं गया तो वो दिन दूर नहीं जब हमारे जीवन में काँव - काँव करने वाले ये काले कौए किताबो के पन्नो में जाकर छुप जायेंगे, और हम यही कहेंगे "कौआ तेरी यही कहानी......."????
रविवार, 26 सितंबर 2010
एक पत्रकार कि पत्रकारिता की मौत....????
मेरा मन आज बहुत ही उदास है तो बैठ गया यह ब्लॉग लिखने कुछ समझ में नहीं आ रहा है की क्या लिखू तो अपने मन की व्यथा ही लिख रहा हूँ......
मैंने चंदौली में सेना भरती मेले में गोली काण्ड को ब्रेक किया, और मुझे लोगो के पत्थर भी पड़े फिर भी मैंने खबर को कवर किया, पर वही जब एक विधायक के बेटे की दूसरी शादी को कवर करने के दौ़रान विधायक के गुंडों द्बारा कैमरा व अन्य उपकरणों को छीन लिया गया और पुलिस की लाठिया खानी पड़ी तो ऑफिस से कोई भी मदद तो दूर सहानभूति भी नहीं आयी जबकि दूसरे चैनलों ने अपना ओ.बी वैन भेज कर दो दिनों तक इसे कवर किया, लगभग ५० से ७० हज़ार का मेरा सामान छिना गया कोई बात करने के बजाय चैनल के इनपुट हेड कोर्डिनेशन के सहयोगी के पीछे खड़े होकर कहलवा रहे थे की अगर १५ मिनट के भीतर फुटेज नहीं आई तो समझो छुट्टी पुलिस की लाठी खाये चोट लगी होने के बावजूद मैंने किसी तरह फुटेज की व्यवस्था कर वहां भेजा, पर मुझसे यह नहीं कहा गया की तुम्हारा क्या हाल है, या क्या हुआ पर वही मुझे पता चला की इनपुट हेड ने अपने मातहतो को आदेश दे रखा है कि सभी स्ट्रिंगर को इतना परेशान कर दो कि उनका खाना पीना सोना हराम हो जाए उनके चेहरे की मुस्कान छीन लो इस कदर उनसे बात करों,
अभी यह सब चल ही रहा था और किसी तरह ये लोग मुझसे स्टोरी ले रहे थे पर अब तो ये लोग मुझसे स्टोरी लेना बंद कर दिए और ना ही मेरी पेमेंट ही किया है, कोऑर्डिनेशन हेड को फोन करता हूँ तो मुझे अछूत समझते हुए मुझसे बात ही नहीं करती और जब चैनल के सम्पादक से बात करता हूँ वो कहते है की मै देखता हूँ, ना मेरी पेमेंट हो रही है और ना ही मुझे यह कहा जा रहा है कि तुम्हे हटा दिया गया है, चैनल में १० वर्षो से काम करने का यही सिला मिला कि मुझे कदम - कदम पर अपमानित किया गया फिर भी मै काम करता रहा हूँ अब मेरी इच्छा पत्रकारिता करने कि नहीं रह गई, मुझे अब महसूस हो रहा है कि मैंने पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रख कर बहुत बड़ी गलती की है और अपना काफी समय बर्वाद किया अगर मै यही १०-१५ वर्ष किसी और क्षेत्र को देता तो शायद मेरा और मेरे परिवार की नैया पार हो जाती इस चैनल और पत्रकारिता ने मुझे इस कदर तबाह किया की मै सड़क पर भीख माँगने को मज़बूर हूँ, यह बात यही नहीं ख़त्म होती मैंने अपने वरिष्ठ साथियों से भी बात की कि मुझे कही और किसी चैनल में या अखबार में काम दिला दीजिये तो उन लोगो ने भी मुझसे अपना पल्ला ऐसे झाड़ा कि मै इसे जानता ही नहीं हूँ और ये वही लोग है जब ये हमारे शहर में आते थे तो मै इनकी जी हुजूरी में दिन रात लगा रहता था, कि कही इन्हें किसी तरह कि परेशानी न हो पर क्या पता था कि ये लोग बरसाती मेढक कि तरह होते है काम निकल जाने पर मै कौन ? वो कौन ?
मैंने अपने रहते कई लोगो को काम सिखाया और कुछ को तो चैनलों में नौकरी भी दिलाई पर इन लोगो ने भी मेरी पीठ पर छुरा मार कर मुझे आहत कर दिया मैंने सोचा था कि कुछ नहीं तो अपने काम आयेंगे पर ये लोग भी दोगले किस्म के निकले, मुझसे यहाँ भी बहुत बड़ी गलती हो गयी और मै इन इंसानों को पहचानने में गलती कर बैठा,
आप ही बताएं कि मेरी आर्थिक स्थिति बहुत ख़राब हो चुकी है और मानसिक रूप से इतना परेशान हूँ कि यही इच्छा हो रही है कि अब मै अपनी मौत को अंजाम दे दूँ
मै एक बहुत ही मध्यम परिवार का सदस्य हूँ और मुझ पर से मेरे पिता का साया ४ वर्ष की आयु में ही उठ गया और मेरी माँ ने मुझे और मेरे छोटे भाई को किसी तरह से पढाया लिखाया, १९८८ - ८९ में मै जब १० वी की पढाई कर रहा था तभी मुझमे आर्टिकल लिखने का शौक जागा, और मै अक्सर किसी न किसी विषय पर लेख लिखता रहता था पर उसे कही भेजता नहीं था, और जब ११ वी में आया तो मुझसे किसी ने कहा की तुम इतनी बढ़िया लेख लिखते हो इसे कही ना कही प्रकाशन के लिए भेज दिया करो तो तुम्हारा जेब खर्च भी निकल जाया करेगा, फिर मै स्थानीय अखबार दैनिक आज में लिख देता था फिर कॉलेज की घटनाओं को देने लगा तो स्थानीय दैनिक स्वतंत्र भारत ने मुझे कॉलेज का प्रतिनिधि बना दिया, फिर मैंने अपना कदम बढाया, और दिल्ली प्रेस की पत्रिकाओं में लेख लिखने लगा तो वहा भी मुझे युवा प्रतिनिधि का दर्जा मिला और फिर मेरा उत्साह वर्धन बढ़ने लगा और जब मैंने बी.ए में पढाई कर रहा था तभी मुझे स्थानीय साप्ताहिक अखबार वन्देमातरम का उप सम्पादक बन कर काम करने का मौका मिला और इसी बीच मेरा संपर्क मुंबई से प्रकाशित होने वाले दैनिक सामना के लोगो से हुआ और मै उनके प्रतिनिधि के तौर पर पूर्वी उत्तर प्रदेश की खबरों को कवर करने लगा, मेरी यहाँ की तमाम खबरें सामना / दोपहर का सामना की मुख्य पृष्ठ छपी, और इसी बीच मुझे गुजरात जाने का मौका मिला तो साप्ताहिक वन्देमातरम अखबार ने अपना ब्यूरो चीफ नियुक्त कर दिया तो वही दैनिक सामना ने भी अपना संवाददाता नियुक्त कर दिया और इसी दौरान २६ जनवरी २००१ में मुझे देश के सबसे पुराने निजी चैनल के क्षेत्रीय न्यूज़ चैनल में काम करने का मौका मिला मैंने इसे अपनी खुशनसीबी समझा और जी जान लगा कर बड़े ही इमानदारी के साथ काम करना शुरू कर और नियुक्ति के पहले दिन ही मैंने भूकंप की खबरों को ब्रेक किया, और वही दूसरी तरफ मैंने समाचार पत्रों से इस्तीफा दे दिया, और मैंने अपने काम को पूरी निष्ठा इमानदारी के साथ पूरे एक साल तक निभाया फिर मै वापस वाराणसी आया, तो जनवरी २००३ में मुझे देश के सबसे पुराने इसी न्यूज़ चैनल से कॉल आया और मुझे वाराणसी में जगह खाली है क्या आप वहां पर स्ट्रिंगर के रूप में काम करेंगे तो मैंने अपनी स्वीकृति दे दी और फिर मुझे नोएडा बुला कर मुझसे मेरा इंटरव्यू लिया गया, और वर्त्तमान सम्पादक जो उस समय इनपुट हेड हुआ करते थे उन्होंने मेरी नियुक्ति को ओके किया और मै यहाँ पर भी मैंने अपनी पूरी इमानदारी और निष्ठां से अपना दायित्व संभालते हुए खबरों को कवर कर भेजने लगा, मैंने जून २००३ में पावर लिफ्टिंग प्रतियोगिता में डोपिंग को एक्सपोज किया, तो मुग़लसराय में पेट्रोल चोरी का खुलासा किया, और चंदौली के नौगढ में नक्सली वारदातों को कवर किया तो वाराणसी न्यायालय में फर्जी किसान बही के द्बारा जमानत के मामलों का भंडाफोड़ किया, तो सबसे पहले वाराणसी में ध्वनी व वायु प्रदुषण के खतरों को उजागर किया, और वही मैंने वाराणसी में आतंकवादी धमाको की खबर को सबसे पहले ब्रेक किया था, मुझे इन कंपनी के द्बारा चंदौली, सोनभद्र, बलिया, गोरखपुर, आजमगढ़, जौनपुर भदोही, और मिर्जापुर भी भेज दिया जाता था खबरों को कवर करने के लिए, और मै कंधे पर कैमरा और ट्राईपोड लादे अपनी मोटर साइकिल से पहुच जाता था, और कभी टैक्सी ले जाने की इजाजत मिली तो मै टैक्सी से भी जाता था,
मैंने चंदौली में सेना भरती मेले में गोली काण्ड को ब्रेक किया, और मुझे लोगो के पत्थर भी पड़े फिर भी मैंने खबर को कवर किया, पर वही जब एक विधायक के बेटे की दूसरी शादी को कवर करने के दौ़रान विधायक के गुंडों द्बारा कैमरा व अन्य उपकरणों को छीन लिया गया और पुलिस की लाठिया खानी पड़ी तो ऑफिस से कोई भी मदद तो दूर सहानभूति भी नहीं आयी जबकि दूसरे चैनलों ने अपना ओ.बी वैन भेज कर दो दिनों तक इसे कवर किया, लगभग ५० से ७० हज़ार का मेरा सामान छिना गया कोई बात करने के बजाय चैनल के इनपुट हेड कोर्डिनेशन के सहयोगी के पीछे खड़े होकर कहलवा रहे थे की अगर १५ मिनट के भीतर फुटेज नहीं आई तो समझो छुट्टी पुलिस की लाठी खाये चोट लगी होने के बावजूद मैंने किसी तरह फुटेज की व्यवस्था कर वहां भेजा, पर मुझसे यह नहीं कहा गया की तुम्हारा क्या हाल है, या क्या हुआ पर वही मुझे पता चला की इनपुट हेड ने अपने मातहतो को आदेश दे रखा है कि सभी स्ट्रिंगर को इतना परेशान कर दो कि उनका खाना पीना सोना हराम हो जाए उनके चेहरे की मुस्कान छीन लो इस कदर उनसे बात करों,
अभी यह सब चल ही रहा था और किसी तरह ये लोग मुझसे स्टोरी ले रहे थे पर अब तो ये लोग मुझसे स्टोरी लेना बंद कर दिए और ना ही मेरी पेमेंट ही किया है, कोऑर्डिनेशन हेड को फोन करता हूँ तो मुझे अछूत समझते हुए मुझसे बात ही नहीं करती और जब चैनल के सम्पादक से बात करता हूँ वो कहते है की मै देखता हूँ, ना मेरी पेमेंट हो रही है और ना ही मुझे यह कहा जा रहा है कि तुम्हे हटा दिया गया है, चैनल में १० वर्षो से काम करने का यही सिला मिला कि मुझे कदम - कदम पर अपमानित किया गया फिर भी मै काम करता रहा हूँ अब मेरी इच्छा पत्रकारिता करने कि नहीं रह गई, मुझे अब महसूस हो रहा है कि मैंने पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रख कर बहुत बड़ी गलती की है और अपना काफी समय बर्वाद किया अगर मै यही १०-१५ वर्ष किसी और क्षेत्र को देता तो शायद मेरा और मेरे परिवार की नैया पार हो जाती इस चैनल और पत्रकारिता ने मुझे इस कदर तबाह किया की मै सड़क पर भीख माँगने को मज़बूर हूँ, यह बात यही नहीं ख़त्म होती मैंने अपने वरिष्ठ साथियों से भी बात की कि मुझे कही और किसी चैनल में या अखबार में काम दिला दीजिये तो उन लोगो ने भी मुझसे अपना पल्ला ऐसे झाड़ा कि मै इसे जानता ही नहीं हूँ और ये वही लोग है जब ये हमारे शहर में आते थे तो मै इनकी जी हुजूरी में दिन रात लगा रहता था, कि कही इन्हें किसी तरह कि परेशानी न हो पर क्या पता था कि ये लोग बरसाती मेढक कि तरह होते है काम निकल जाने पर मै कौन ? वो कौन ?
मैंने अपने रहते कई लोगो को काम सिखाया और कुछ को तो चैनलों में नौकरी भी दिलाई पर इन लोगो ने भी मेरी पीठ पर छुरा मार कर मुझे आहत कर दिया मैंने सोचा था कि कुछ नहीं तो अपने काम आयेंगे पर ये लोग भी दोगले किस्म के निकले, मुझसे यहाँ भी बहुत बड़ी गलती हो गयी और मै इन इंसानों को पहचानने में गलती कर बैठा,
आप ही बताएं कि मेरी आर्थिक स्थिति बहुत ख़राब हो चुकी है और मानसिक रूप से इतना परेशान हूँ कि यही इच्छा हो रही है कि अब मै अपनी मौत को अंजाम दे दूँ
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